Navratri Mantra – नवरात्रि के चमत्कारी मंत्र

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।तृतीयं चन्द्रघंटेतिकूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।पंचमं स्क्न्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।सप्तमं कालरात्रीतिमहागौरीति चाष्टमम् ।।नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।।

स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गात्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतांभजामि॥

वन्दे वाञ्छितलाभायचन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रींयशस्विनीम्॥

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

पिण्डज प्रवरारूढ़ाचण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसीदम तनुते महयं चन्द्रघण्टेतिविश्रुता।।

NAVRATRI IMAGE

सिंहासनगता नित्यंपद्माश्रितकरद्वया. शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमातायशस्विनी.

स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गात्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतांभजामि॥

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा !
बलादाक्रष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति !!

अर्थ:- वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं !

दुर्गे स्म्रता हरसि भीतिमशेषजन्तो: 
             स्वस्थे: स्म्रता मतिमतीव शुभाम् ददासि !
दारिद्र्यदुख:भयहारिणी का त्वदन्या 
             सर्वोपकारकर्नाय  सदार्द्रचित्ता !!

अर्थ:- माँ दुर्गे ! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्वारा चिंतन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं ! दुःख दरिद्रता और भय हरने वाली देवी ! आपके सिवा दूसरी कौन है , जिसका चित सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो !!

दुर्गा सप्तश्लोकी

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।।१।।

दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेष जन्तो:

स्वस्थै: स्मृता मति मतीव शुभां ददासि

दारिद्र्य दु:ख भय हारिणि का त्वदन्या

सर्वोपकार करणाय सदार्द्र चित्ता ।।२।।

सर्व मङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके

शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते ।।३।।

शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे

सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते ।।४।।

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्ति समन्विते

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तुते ।।५।।

रोगान शेषा नपहंसि तुष्टा

रुष्टा तु कामान् सकलान भीष्टान् ।

त्वामाश्रितानां न विपन् नराणां

त्वामाश्रिता ह्या श्रयतां प्रयान्ति ।।६।।

सर्वा बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि

एकमेव त्वया कार्यमस्मद् वैरि विनाशनं ।।७।।

इति सप्तश्लोकी दुर्गास्तोत्र सम

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